जॉन पर उखड़े अर्जुन कपूर? ‘मुंबई सागा’ से क्‍लैश पर बोले- हमेशा नहीं पूछ सकते ऐसा क्‍यों किया

कोरोना वायरस महामारी (Coronavirus) के कारण करीब एक साल इंतजार करने के बाद ऐक्टर अर्जुन कपूर (Arjun Kapoor) अपनी नई फिल्म ‘संदीप और पिंकी फरार’ (Sandeep Aur Pinky Faraar) के साथ थिअटर्स की रौनक बढ़ा रहे हैं। नवभारत टाइम्‍स से खास बातचीत में अर्जुन ने इस फिल्म, ‘मुंबई सागा’ (Mumbai Saga) संग इसके क्लैश, कोविड (Covid-19) के साथ अपनी जंग जैसे कई विषयों पर खुलकर बात की। बातचीत के कुछ अंश:

‘संदीप और पिंकी फरार’ करीब साढ़े तीन साल पहले बननी शुरू हुई थी जबकि कोविड के बाद तो हमारी पूरी दुनिया ही बदल चुकी है। क्या अब भी यह फिल्म उतनी ही प्रासंगिक है? लोग इससे उतना ही रिलेट करेंगे?
‘मैं तो मानता हूं कि अब इसकी रेलवेंस और भी ज्यादा है। देखिए, लोग तो वही हैं। लोगों की जिंदगी की बाधाएं, उसका महत्व वही है। फिर क्लास डिवाइड (अमीर-गरीब), जिसके बारे में फिल्म बनी है या यह जो नया भारत है, जिसके बारे में फिल्म बनी है, वह तो वैसा ही है। हां, समय बीतता है तो चीजें बदलती हैं लेकिन जो मूल वैल्यू होती है, उससे आप रिलेट कर ही पाते हैं। जब हम 15-20 साल पुरानी फिल्में देखते हैं, तब भी कुछ चीजें हमारे दिल को छू जाती हैं तो एक-डेढ साल में ऐसा नहीं हो सकता कि हमारे इमोशन्‍स और सोच पूरी तरह बदल जाए। निश्चित तौर पर लोग आज अलग मुश्किलों से गुजर रहे हैं पर इमोशन्‍स तो वही हैं।’

पिछले साल आप खुद कोविड से लड़कर वॉरियर बनकर निकले। वह दौर कितना मुश्किल रहा? और ओवरऑल बीते साल को आप किस तरह से देखते हैं?
‘जी, बिल्‍कुल मुश्किल था। जब तक आप पर नहीं बीतती, तब तक आपको इसका अंदाजा नहीं होता। जो तनाव होता है, इमोशनली, मेंटली, वह आप पर और आपके परिवारवालों पर कैसे असर करता है, वह जब मुझ पर बीती तभी अंदाजा हुआ। हालांकि, मैं यह मानता हूं कि मेरा पिछला साल कोविड के साथ भी एक अच्छा साल रहा क्योंकि मुझे अपने बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला। आपके सामने जब अचानक कोई मुसीबत आती है तो उसी में आप सीखते हैं। जब मुझे कोविड हुआ तो कठिनाई हुई। हालांकि, मुझे बहुत हल्के लक्षण थे। डॉक्टर्स, मेरे घरवालों और मेरे खुद की वजह से मैं जल्दी ठीक हो गया। उसके बाद मैंने एक पूरी फिल्म ‘भूत पुलिस’ (Bhoot Police) शूट की तो मेरी रिकवरी अच्छी रही, टचवुड। काम करने की एनर्जी भी वापस आ गई और मजा भी आने लगा क्योंकि आप कोविड से पॉजिटिव तरीके से लड़कर निकले। वह बहुत ही अलहदा साल था। सबने ही शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तौर पर उतार-चढ़ाव महसूस किया। मैं भी उनमें से एक था लेकिन मैं मानता हूं कि मैं कोविड को हराकर नहीं, जिंदगी के साथ जीतकर वापस आया हूं तो मेरे लिए यह बहुत जरूरी था कि हम नेगेटिव के बजाय साल के पॉजिटिव साइड को देखें।’

फिल्म इंडस्ट्री के नजरिए से बीते साल को कैसा मानते हैं? क्योंकि इंडस्ट्री के लिए भी काफी मुश्किल साल रहा, एक ओर थिअटर्स बंद रहे तो दूसरी ओर तमाम तरह के आरोप लगते रहे। आपको लगता है कि उससे इंडस्ट्री को चोट पहुंची?
‘देखिए, हम फनकार हैं। हमारा काम है लोगों को एंटरटेन करना। हमने वह काम ओटीटी के जरिए किया जब थिअटर बंद थे और अब जब थिअटर खुल गए हैं तो रूही के कलेक्शन आप देख सकते हैं कि वे भी अच्छे हो गए हैं। मैं मानता हूं कि जो हमारी ऑडियंस है या जो हमारे चाहनेवाले हैं, वे जानते हैं और मानते हैं कि हम उनके लायक हैं, एंटरटेनमेंट के लिए और हम जिंदगीभर यह जिम्मा उठाकर चले हैं कि हम उनसे कनेक्ट कर सकें, हमारा काम ऑडियंस तक पहुंचे। इसके लिए पॉजिटिविटी बनाए रखनी पड़ती है क्योंकि लोग तो हमें प्यार दे ही रहे हैं। ओटीटी पर फिल्में पसंद आई हैं, थिअटर में रूही चली है, आगे भी और फिल्में आ रही हैं तो मैं यह मानता हूं कि जो ऑडियंस का लगाव था, वह आज भी है। उनका प्यार हमारे साथ है। भूत पुलिस की शूटिंग के दौरान मैं हिंदुस्तान घूमकर आया हूं और चाहे धर्मशाला हो या जैसलमेर, लोगों का ढेर सारा प्यार मिला, दुआएं मिलीं। लोगों से जो बातचीत हुई, उससे साफ था कि उन्हें एंटरटेनमेंट चाहिए, उन्हें हमारी फिल्मों का इंतजार है तो मैं इस पर फोकस करना चाहूंगा कि लोगों को अपने काम से एंटरटेन कर सकूं।’

आपकी फिल्म के साथ ही ‘मुंबई सागा’ भी रिलीज हुई है। आपको लगता है कि मौजूदा माहौल में ऑडियंस दो-दो फिल्में देखने के लिए तैयार है?
‘हमने अपनी फिल्म की रिलीज डेट अनाउंस की, उसके बाद एक दूसरी फिल्म की डेट अनाउंस हो गई तो हम बहस तो नहीं कर सकते उनके साथ। उन्होंने अपने हिसाब से सोच समझकर ही किया होगा। मैं मानता हूं कि आज इंडस्ट्री ऐसे दौर से गुजर रही है जहां लोगों को एक-दूसरे का सहारा बनना चाहिए। जब ऐसी चीजें होती हैं तो थोड़ा ऊटपटांग जरूर लगता है लेकिन उनके अपने कारण होंगे। हम हर बार फोन उठाकर पूछ नहीं सकते कि भई, आपने ऐसा क्यों किया? हमने थिअटर को इज्जत दी। हमने इस फिल्म को थिअटर में लाने के लिए एक साल इंतजार किया। हमने जिस दिन डेट अनाउंस की, उसके बाद एक फिल्म आई है तो ठीक है। वह बड़ी फिल्म है, हम आशा करते हैं कि दोनों फिल्में चलें। हमारा काम है कि हम अपनी फिल्म थिअटर को सौंप दें और देखते हैं कि लोगों को कौन सी फिल्म पसंद आती है। हो सकता है कि दोनों ही पसंद आएं क्योंकि दोनों ही अलग फिल्में हैं।’

इस फिल्म में आप पहली बार एक ठेठ जाट का किरदार निभा रहे हैं। उसके लिए क्या खास तैयारी करनी पड़ी?
‘जब मैंने यह फिल्म साइन की थी तो दिबाकर सर (डायरेक्टर दिबाकर बनर्जी) ने कॉन्ट्रैक्ट में लिखवाया था कि मुझे तीन महीने उनके साथ तैयारी करनी होगी। फिल्म की शूटिंग सिर्फ 40 दिन थी लेकिन तैयारी 90 दिन की थी। दिबाकर सर रोज मेरे घर आकर मेरे लहजे पर काम करते थे। वह चाहते थे कि मैं दिल्ली के एक जाट की तरह ही बोलूं। उन्होंने मेरे लिए एक डाइलेक्ट कोच भी रखा। वह मुझसे रोज न्यूपेपर पढ़वाते थे, जाट वाले लहजे में ही बात करते थे। पिंकी एक सस्पेंडेड पुलिसवाला है तो हम दिल्ली जाकर एक्स पुलिस अफसरों से भी मिले। लोगों से मिले, बंदूक चलानी सीखी। महिपालपुर जाकर रोज रात को घूमता था ताकि यह समझ सकूं कि पिंकी कहां से आता है तो काफी गहरी तैयारी की थी।’

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